सच कहूँ

सच कहूँ तो बातें लगती हैं,

दिल पे चोट मुझे भी जलती है,

लड़का हूँ बता न पाऊँगा ,

पर आँसू की बूंद आँखों से निकलती है ।

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सच कहूँ तो खुद पे शक होता है,

कभी कभी दिल हुमारा भी रोता है,

मानेंगे कभी नहीं , पर कभी कभी,

हुमें भी कुछ कुछ होता है।

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वैसे तो चुप चुप से रहते है,

वैसे तो गुम गुम से रहते है,

पर जो किसी ने उठाई उंगली,

तो कभी चुपचाप न सहते हैं।

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सच कहूँ तो रोज़ मरते हैं,

प्यार से हम भी डरते हैं,

यूं तो दिल में प्यार है,

पर दिल का एतबार नहीं करते है।

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कभी नींद नहीं आती, कभी बचचे सा सोते है,

कभी खुलके हस्ते है, कभी रोते हैं,’

क्यूंकी सबको नहीं पता पर,

मर्द भी इंसान होते है।

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